Bal Gangadhar Tilak

बाल गंगाधर तिलक


जन्म:  23 जुलाई 1856 चिकल गाँव रत्नागिरी, महाराष्ट्र
मृत्यु : 1 अगस्त 1920, मुंबई

विद्वान, गणितज्ञ, दार्शनिक और उग्र राष्ट्रवादी व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की नींव रखने में सहायता की। उन्होंने 'इंडियन होमरूल लीग' की स्थापना सन् 1914 ई. में की और इसके अध्यक्ष रहे तथा सन् 1916 में मुहम्मद अली जिन्ना के साथ लखनऊ समझौता किया, जिसमें आज़ादी के लिए संघर्ष में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रावधान था।

प्रारंभिक जीवन:-

    बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को रत्नागिरी में मध्यवर्ती चिट्पावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, दक्षिण-पश्चिमी महाराष्ट्र के एक छोटे से तटीय शहर में। उनके पिता, गंगाधर शास्त्री रत्नागिरी में एक प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और स्कूल शिक्षक थे। उनकी मां का नाम परावली बाई गंगाधर था। अपने पिता के तबादले के बाद परिवार पूना में स्थानांतरित हो गया। 1871 में तिलक का ताइपिबा से विवाह हुआ, जिसके बाद सत्यभामा बाई रखा लिए।

तिलक एक प्रतिभाशाली छात्र थे।एक बच्चे के रूप में, वह स्वभाव में सच्चे और सीधे थे। अन्याय के प्रति असहिष्णु रुख था और कम उम्र से स्वतंत्र राय थी। 1877 में संस्कृत और गणित में डेक्कन कॉलेज, पुणे से स्नातक होने के बाद, तिलक ने एल.एल.बी. का अध्ययन किया। सरकार लॉ कॉलेज, बॉम्बे में उन्होंने 1897 में अपनी क़ानून की डिग्री प्राप्त की। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पूना के एक निजी स्कूल में अंग्रेजी और गणित की पढ़ाई शुरू कर दी। स्कूल के अधिकारियों के साथ असहमति के बाद उन्होंने पद छोड़ दिया और 1880 में एक स्कूल स्थापना करने में मदद की जिसमें राष्ट्रवाद पर जोर दिया। यद्यपि, वह एक आधुनिक, महाविद्यालय की शिक्षा पाने के लिए भारत की पहली पीढ़ी के युवाओं में से एक थे, तिलक ने भारत में ब्रिटिश शासन के बाद शैक्षणिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने ब्रिटिश विद्यार्थियों के मुकाबले भारतीय छात्रों के असमान व्यवहार और भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए उनकी उपेक्षा के खिलाफ विरोध किया। उनके अनुसार, शिक्षा उन सभी भारतीयों के लिए पर्याप्त नहीं थी जो अपने मूल के बारे में बेहद अनजान रहे। उन्होंने भारतीय छात्रों के बीच राष्ट्रवादी शिक्षा को प्रेरित करने के उद्देश्य से कॉलेज बैचमैटेट्स, विष्णु शास्त्री चिपलुनकर और गोपाल गणेश आगरकर के साथ डेक्कन एजुकेशनल सोसाइटी की शुरुआत की। उनकी शिक्षण गतिविधियों के समानांतर, तिलक ने दो अख़बार 'केसरी' को मराठी में और अंग्रेजी में 'महरत' की स्थापना की।

करियर:-

परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपनी सेवाएं पूर्ण रूप से एक शिक्षण संस्था के निर्माण को दे दीं। सन्‌ 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल और कुछ साल बाद फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापन की। और 1885 में राष्ट्रीय सभा स्थापना हुई थी, लोकमान्य तिलक उसमे शामिल हुए।
ये आधुनिक कालेज शिक्षा पाने वाली पहली भारतीय पीढ़ी में थे। इन्होंने कुछ समय तक स्कूल और कालेजों में गणित पढ़ाया। अंग्रेजी शिक्षा के ये घोर आलोचक थे और मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है। इन्होंने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की ताकि भारत में शिक्षा का स्तर सुधरे।

1881 में जनजागरण के लिए तिलक ने मराठी में 'मराठा दर्पण' व 'केसरी' नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किये जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए। तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया।

तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन जल्द ही वे कांग्रेस के नरमपंथी रवैये के विरुद्ध बोलने लगे। 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गयी। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे। इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा।

1893 में 'ओरायन' नाम के किताब का प्रकाशन किए। लोगों मे एकता की भावना निर्माण करने के लिए तिलक इन्होंने 'सार्वजानिक गणेश उत्सव' और 'शिव जयंती उत्सव' शुरू किया, इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंगरेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया।

1897 में तिलक इनपर राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें एक साल छः महीने की सजा सुनाई गयी। उस समय तिलक ने अपने बचाव में जो भाषण दिया था वह 4 दिन और 21 घंटे चला था।

1908 मे तिलक और इनके क्रांतिकारी कदमों से अंगरेज बौखला गए और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाकर छ: साल के लिए ‘देश निकाला’ का दंड दिया और बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया। जेल की अवधि में तिलक ने गीता का अध्ययन किया और गीता रहस्य नामक भाष्य भी लिखा। तिलक के जेल से छूटने के बाद जब उनका गीता रहस्य प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार-प्रसार आंधी-तूफान की तरह बढ़ा और जनमानस उससे अत्यधिक आंदोलित हुआ।

1916 में उन्होंने डॉ. अनी बेसेंट इनके सहकार्य से ‘होमरूल लीग’ संघटन की स्थापना की। भारतीय होमरूल आन्दोलन ने स्वयं शासन के अधिकार ब्रिटिश सरकार को मांगे। होमरूल यानि अपने राज्य का प्रशासक हम खुद करे, इसे ही ‘स्वशासन’ कहते है। ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मै इसे लेकर रहूँगा’ ऐसा तिलक इन्होंने विशेष रूप से बताया। होमरूल आन्दोलन की वजह से राष्टीय आन्दोलन में नवचैतन्य निर्माण हुआ।

लोकमान्य बाल गंगधर तिलक ने लीग के उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिये लगभग 100 से भी ज्यादा सभाओं का आयोजन किया। 1919 में जलियावाला बाग हत्या कांड की इन्होंने अपने लेखों के माध्यम से आलोचना की और बहिष्कार के आन्दोलन को जारी रखने की अपील की। इन्होंने इस सन्दर्भ में सांगली, हैदराबाद, कराँची, सोलापुर, काशी आदि स्थानों पर भाषण भी दिये।

हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा होनी चाहिए ये घोषणा तिलक इन्होंने सबसे पहले की थी। “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा!” ये कथन उन्होंने ही दिया।

मृत्यु:-


ब्रिटिश सरकार ने बाल गंगाधर तिलक को 6 साल की जेल की सजा सुनाई थी और इसी दौरान उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। इस कारण वो अपनी मृतक पत्नी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए थे। इसके बाद 1 अगस्त, 1920 को मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए महात्मा गांधी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा और जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें भारतीय क्रान्ति का जनक कहा था।

पुस्तकें :-

तिलक ने यूँ तो अनेक पुस्तकें लिखीं किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या को लेकर मांडले जेल में लिखी गयी गीता-रहस्य सर्वोत्कृष्ट है जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
⇒  वेद काल का निर्णय 
⇒  आर्यों का मूल निवास स्थान 
⇒  श्रीमद्भागवतगीता रहस्य अथवा कर्मयोग शास्त्र
⇒  वेदों का काल-निर्णय और वेदांग ज्योतिष 
⇒  हिन्दुत्व

बाल गंगाधर तिलक के कथन:-

"अपने हितों की रक्षा के लिए यदि हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तो दूसरा कौन होगा? हमे इस समय सोना नहीं चाहिये, हमे अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिये..”

“जब लोहा गरम हो तभी उस पर चोट कीजिये और आपको निश्चय ही सफलता का यश प्राप्त होगा।”

टिप्पणियाँ

  1. ❤️❤️❤️❤️ That's what I was looking for. Thankyou

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  2. अद्भूत अतुलनीय प्रशंसनीय प्रस्तुति की गयी है आपके द्वारा निश्चय ही इतिहास के प्रती रुझान रखने वालो के लिए यह बहुत ही कारगार साबित होगा। निरंतर ऐसे ही लिखते रहिये अवश्य ही आपका यह कदम प्रशंसा के काबिल है।
    शुभकामनाएं 🙏

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  3. संक्षिप्त एवं सटीक जानकारी,सरल शब्दों में मूल्यवान जानकारी।आपके लेखन से भूले बिसरे परन्तु अति महत्त्वपूर्ण जन नायकों की जीवन गाथा का पाठन संभव हो पाया है।

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