बिपिन चंद्र पाल

 बिपिन चंद्र पाल

जन्म:- 7 नवंबर, 1858, हबीबगंज जिला, (वर्तमान बांग्लादेश)

मृत्यु:- 20 मई, 1932, कोलकाता, पश्चिम बंगाल

कार्य क्षेत्र:- स्वतन्त्रता सेनानी, शिक्षक, पत्रकार, लेखक

बिपिन चंद्र पाल एक भारतीय क्रांतिकारी, शिक्षक, पत्रकार व लेखक थे। पाल उन महान विभूतियों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई। वे मशहूर लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक एवं विपिन चन्द्र पाल) तिकड़ी का हिस्सा थे। इस तिकड़ी ने अपने तीखे प्रहार से अंग्रेजी हुकुमत को चलने नहीं दिए थे। विपिनचंद्र पाल राष्ट्रवादी नेता होने के साथ-साथ एक शिक्षक, पत्रकार, लेखक व बेहतरीन वक्ता भी थे। उन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों का जनक भी माना जाता है।

प्रारंभिक जीवन:-

16 साल की उम्र मे बिपिन चंद्र पाल ने ब्राम्हण समाज मे प्रवेश किया, 1876 मे शिवनाथ शास्त्री ने पाल को ब्राम्हण समाज की दिक्षा दी, मूर्ति पूजा न मानने वाले ब्राम्हण समाज के अनुयायी होना मतलब आधा ख्रिश्चन होना ऐसा पुराने विचारों के लोगों का मानना था ये सब रामचंद्र पाल को मालूम हुवा तब उनको बहुत गुस्सा आया उन्होंने बेटे के साथ नाता तोड दिया बाम्हण समाज के काम वो बहुत ही निष्टा से करते थे। कटक, मैसूर और सक्लेश्पुर इस उन्होंने शिक्षक की नौकरी करी थी, भारतीय समाज की प्रगती शिक्षा की वजह से होंगी, ऐसा उनका मानना था।


 1880 मे बिपिन चंद्र ने सक्लेश्पुर इस जगह ‘परिदर्शक’ इस नाम का बंगाली साप्ताहिक प्रकाशित किया, वैसे ही कोलकता आने के बाद उनको वहा के ‘बंगाल पब्लिक ओपिनियन’ के संपादक मंडल मे लिया गया, 1887 में बिपिन चंद्र ने राष्ट्रीय कॉग्रेस के मद्रास अधिवेशन मे पहली बार हिस्सा लिया ‘शस्त्रबंदी कानून के खिलाफ’ उस जगह का भाषण उत्तेजनापूर्ण और प्रेरक रहा 1887 – 88 में उन्होंने लाहौर के 'ट्रिब्यून' का संपादन किया।


 1900 मे बिपिन चंद्र पाल पाश्चात्त्य और भारतीय तत्वज्ञान का तुलनात्मक अभ्यास करने के लिये इंग्लैंड गये वहा के भारतीयो के लिये ‘स्वराज्य’ नाम का पत्र उन्होंने निकाला 1905 मे इंग्लैंड से कोलकता आने के बाद वो ‘द न्यु इंडिया’ नामका अंग्रेजी साप्ताहिक चलाने लगे। 1905 मे गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, जवाहर नेताओ के साथ उन्होंने इस विभाजन का विरोध किया देश मे जागृती कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पुरे देश मे आंदोलन शुरु हुये उस मे से भारतीय राजनीति में लाल – बाल – पाल इन त्रिमूर्तीओं का उदय हुवा।

राजनैतिक कार्य :-

1886 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हिस्सा बने इनकी विचारधारा काफी भिन्न थी और इसी कारण उनका कार्यकर्ताओं के साथ मतभेद होता रहता था तभी 1907 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तब उन्होने कांग्रेस को छोड़ दिया इसके बाद 1916 के लखनऊ अधिवेशन में उन्होने कांग्रेस को वापस जॉइन किया, लेकिन वे मोहनदास करमचंद गांधी की विचारधाराओं से सहमत नहीं थे, और खुलकर उनका विरोध भी करते थे ,और उसी दौरान 1921 में इन्होने फिर से कांग्रेस को छोड़ दिया ।


बंदे मातरम् जनरल :-

बिपिन चन्द्र पाल में दृढ़ता के साथ विरोध प्रदर्शन करने का सामर्थ्य था इसलिए उन्होने स्वदेशी तथा बहिष्कार आंदोलन की पहली वर्षगांठ पर सन 1906 में “वन्दे मातरम्” एक इंग्लिश पत्र को लॉंच करने का साहसी कदम उठाया इस पत्र का विषय भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन का इतिहास था । इस पत्र के सम्पादन के लिए अरबिंदो घोष के द्वारा न्योता दिया गया और उन्होने इसे सहर्ष स्वीकार किया । अरबिंदो एक कुशल लेखक थे और बिपिन एक हौनहार वक्ता, इन दोनों की साजेदारी में बंदे मातरम् का काम आगे बढ़ा । 

18 सितंबर 1906 में इस बंदे मातरम् पत्र में लिखा गया कि यदि हम बल से बल को नहीं काट सकते तो हमे ब्रिटिश सरकार के प्रशासन को कमजोर बना देना चाहिये अर्थात् उन्हे सेवा देना बंद कर देना चाहिये इसीलिए जनरल में अप्रैल 1907 में अरबिंदो ने लिखा कि सरकार का विरोध दो तरह से किया जा सकता हैं हिंसा और अहिंसा जब सरकार हमारे अधिकारों का हनन बल पूर्वक करती हैं तो उसका ज़बाब हिंसात्मक होगा, लेकिन सरकार के लिए कोई कार्य ना करना उसके प्रशासन को अवरुद्ध करेगा और यही चरमपंथियों का मुख्य उद्देश्य हैं ।

बहिष्कार आंदोलन :-

कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में दिसंबर 1906 में अंबिका चरण मजूमदार ने स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार आंदोलन के साथ बिपिन चंद्र पाल का सहयोग किया उस समय बिपिन चंद्र पाल ने एक ज्वलंत भाषण दिया जिसमें था कि बहिष्कार आंदोलन के अर्थ को समझो यह एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु एक शहर से दूसरे शहर, एक प्रांत से दूसरे प्रांत तक बढ़ेगा और व्यापक बनेगा जब तक कि सभी लोग स्वराज का एहसास नहीं कर लेते ।

जनवरी 1907 में बिपिन ने बहिष्कार आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन को एक प्रांत से दूसरे प्रांत में पहुंचाया और इसके लिए वे पूर्वी बंगाल के इलाको में गये, इसके बाद वे कर्नाटक, उड़ीसा, विशाखापट्टनम आखरी में मद्रास आदि स्थानो पर गये और अपने जोशीले भावपूर्ण भाषण के जरिेए अपनी विचारधार को आगे बढ़ाया इन्होने 2 मई 1907 से ‍9 मई 1907 तक मद्रास बीच पर पांच भाषण दिये, जिसमें उन्होने राष्ट्रीय आंदोलन की रूपरेखा, लक्ष्य एवं कार्यक्रम को विस्तार से समझाया महाकवि भारती, सुब्रमणियम शिव एवं श्रीनिवास शास्त्री ने बिपिन के पांचों भाषणो को ध्यान से सुना ।

बिपिन ने स्वदेशी आंदोलन को देश का सबसे जटिल आंदोलन कहा था और यह देखा भी गया क्यूंकि स्वदेशी आंदोलन ने बंगाल से एक नये युग की शुरुवात की थी यह एक गहन आध्यात्मिक आंदोलन था और इसका उद्देश्य हर भारतीय के लिए हर मायने में भारत की मुक्ति था। इस आंदोलन में ब्रिटिश वस्तुओं, स्कूलों, अदालतों और प्रशासन का  बहिष्कार किया गया साथ ही राष्ट्रीय आह्वान के साथ, स्वदेशी निर्माण, राष्ट्रीय शिक्षा, भाषा, साहित्य और इन सबसे ऊपर “स्वराज” या राजनीतिक स्वतंत्रता आदि की अपील की गई ।

रचनाएं और संपादन:-

क्रांतिकारी के साथ-साथ, बिपिन एक कुशल लेखक और संपादक भी थे। उन्होंने कई रचनाएँ भी की और कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

  • इंडियन नेस्नलिज्म
  • नैस्नल्टी एंड एम्पायर
  • स्वराज एंड द प्रेजेंट सिचुएशन
  • द बेसिस ऑफ़ रिफार्म
  • द सोल ऑफ़ इंडिया
  • द न्यू स्पिरिट
  • स्टडीज इन हिन्दुइस्म
  • क्वीन विक्टोरिया – बायोग्राफी

सम्पादन

उन्होंने लेखक और पत्रकार के रूप में बहुत समय तक कार्य किया।

  1. परिदर्शक (1880)
  2. बंगाल पब्लिक ओपिनियन ( 1882)
  3. लाहौर ट्रिब्यून (1887)
  4. द न्यू इंडिया (1892)
  5. द इंडिपेंडेंट इंडिया (1901)
  6. बन्देमातरम (1906, 1907)
  7. स्वराज (1908 -1911)
  8. द हिन्दू रिव्यु (1913)
  9. द डैमोक्रैट (1919, 1920)
  10. बंगाली (1924, 1925)

निधन:-

20 मई 1932 को इस महान क्रन्तिकारी का कोलकाता में निधन हो गया। वे लगभग 1922 के आस-पास राजनीति से अलग हो गए थे और अपनी मृत्यु तक अलग ही रहे।


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें